धन्य हुआ क्रिकेट जगत की तुम आए, अपनी विलक्षण शक्ति का प्रदर्शन कर एक ध्रुव केन्द्र को समा गये|
आज संपूर्ण क्रिकेट जगत मानो इसी सोच लिए खुद को थोड़ा खूश करने की कोशिश में जुटा हुआ है| सन् १९८९ से अनवरत क्रिकेट की दुनिया को अपना लोहा मनवाने का सपना लिए वो हर दिन एक नयी मंज़िल को छूता चला गया, और सचिन तेंदुलकर के इस सफ़र में तय होते गये वो सारे रास्ते जो कभी इस खेल को लिपीबद्ध करने वाले जॉन विस्डेन ने शायद ही कभी सोचा होगा की इंग्लेंड की धरती पे जन्मा यह खेल आज ऑस्ट्रेलिया, साउत अफ्रीका, न्यूजीलॅंड होते हुए भारतीय उपनिवेश में ही पुनर्जन्म लेगा और इस पुनर्जन्म का सूत्रधार बनेगा... मास्टर ब्लास्टर सचिन रमेश तेंदुलकर....|
यह बात १९८९ की है, उस वक़्त मैं सातवी क्लास का छात्र था| क्रिकेट मे काफ़ी रूचि रखता था और आज भी बदस्तूर जारी है| ये वो वक़्त था, जब क्रिकेट हमारे देश में हॉकी, फूटबाल जैसे विश्वस्तरीय खेलों के बीच एक अच्छी पैठ बनाने की दश्तक दे चुका था, और इसकी बुनियाद देने का काम १९८३ में कपिल देव, सुनील गावसकर, मोहिंदर अमरनाथ, दिलीप वेंगसरकर जैसे महारथियों ने भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलवा कर किया था| लेकिन वो दिन आज भी मुझे याद है जब इसे गति देने का काम किया था ऑस्ट्रेलिया की धरती पे चॅंपियन्स ट्रोफी की जीत ने...| रवि शास्त्री को मैंन ऑफ द सिरीज़ में ऑडी कार दी गयी थी, और टीम के सारे खिलाड़ी उस कार में बैठ जीत का जस्न मना रहे थे... और मैं अपने परोश के मित्र के साथ सामने वाले मंडल जी के घर की खिड़की से टेलिवीजॅन में आ रहे उस विहंगम दृश्य का आनंद ले रहे थे| उस वक़्त हमारे शहर के कुछ ही घरों में टेलिवीजॅन सेट हुआ करता था| फिर हम उस दृश्य का रिहरशल उस घर पे रखी एक पुरानी जीप पे बैठ हर दिन किया करते... और संभवतः ऐसी स्वप्निल मानसिकता उस समय के युवा वर्ग में चरम पे थी| भारत ने क्रिकेट की जिस साख को विदेशी ज़मीनी पे पनपाया था आज ज़रूरत थी उस साख को बनाए रखने की भी... | फिर शारजाह में पाकिस्तान के जावेद मियाँदाद का भारत के चेतन शर्मा के मॅच के अंतिम गेंद पे पड़े छक्के को कोई कैसे भूल सकता है| ... जीत और हार के इसी दंश में आगमन हुआ क्रिकेट के ध्रुव का... जिसका नाम था सचिन रमेश तेंदुलकर| महज १६ साल में ही १९८९ के पाकिस्तान दौरे में भारतीय टीम में चयन होना, काफ़ी अचम्भित करने जैसा था| हमारे स्कूली दिनो में वो हमेशा चर्चा का विषय बना रहता और फिर कभी मॅच हो तो... स्कूल नहीं जाने के कितने बहानो को अंजाम देना होता| पाकिस्तान में हुए उस चॅरिटी मॅच में जिसमे सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के महान लेग स्पीनेर अब्दुल क़ादिर के लगातार चार गेंदों पे छक्के जड़े थे वो स्कूल के बहाने अपने सामने वाले प्रोफेसर साहब के यहाँ जाकर ही देखा था| मेरे डॉन बॉस्को स्कूल के दिनो में मैं ओपनिंग करता और एक ओर से विकेट बचाने का प्रयास किया करता| मुझे उस समय मोंहम्मद अज़हरुद्दीन की क्लास बहूत भाती, और यह मेरी पतली दुबली काया के अनुकूल भी थी| फिर एक बार हमारी क्लास की टीम एक जूनियर क्लास के टीम से हार गयी| उस टीम में एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज था, मनीष वर्धन, जिसका बाद में झारखंड स्टेट से रणजी ट्रॉफ़ी के लिए आज के भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के साथ सेलेक्षन हुआ और फिर उसने झारखंड की कप्तानी भी की और आज भी भारतीय रेलवे में कार्यरत रह झारखंड के लिए खेल रहा है|
अपने नागपुर के इंजिनियरिंग दिनो में पहली बार भारत और श्री लंका के बीच हुए टेस्ट मॅच को देखने का मौका मिला| भारत ने टॉस जीत पहले बल्लेबाजी का फ़ैसला किया था, और पहले दिन का खेल ख़त्म होने तक नवजोत सिंह सिद्धू और सचिन तेंदुलकर क्रीज़ पे थे| बस क्या था... मॅच के दूसरे दिन हम निकल पड़े नागपुर के विदर्भ स्टेडियम की ओर...| नागपुर के सारे रास्ते स्टेडियम की ओर ही जा रहे थे| एक अजीब सा आकर्षण था, मॅच देखने से ज़्यादा... तेंदुलकर को बॅटिंग करते देखने का था... अंदर जाने की लंबी क़तारों में टिकेट हाथ में लिए... फिर जैसे ही स्टेडियम के अंदर पहुँचा, तो सीधा जा पहुँचा एक दम उपर....| उस जगह से दृश्य ऐसा मानो... हरे भरे मैदान में हम सभो का चहेता ... सचिन तेंदुलकर की कृष्ण-लीला हमें लुभा रही हो... कुछ इस तरह......... क्रमश:... क्रमशः....|
विप्र प्रयाग घोष
आज संपूर्ण क्रिकेट जगत मानो इसी सोच लिए खुद को थोड़ा खूश करने की कोशिश में जुटा हुआ है| सन् १९८९ से अनवरत क्रिकेट की दुनिया को अपना लोहा मनवाने का सपना लिए वो हर दिन एक नयी मंज़िल को छूता चला गया, और सचिन तेंदुलकर के इस सफ़र में तय होते गये वो सारे रास्ते जो कभी इस खेल को लिपीबद्ध करने वाले जॉन विस्डेन ने शायद ही कभी सोचा होगा की इंग्लेंड की धरती पे जन्मा यह खेल आज ऑस्ट्रेलिया, साउत अफ्रीका, न्यूजीलॅंड होते हुए भारतीय उपनिवेश में ही पुनर्जन्म लेगा और इस पुनर्जन्म का सूत्रधार बनेगा... मास्टर ब्लास्टर सचिन रमेश तेंदुलकर....|
यह बात १९८९ की है, उस वक़्त मैं सातवी क्लास का छात्र था| क्रिकेट मे काफ़ी रूचि रखता था और आज भी बदस्तूर जारी है| ये वो वक़्त था, जब क्रिकेट हमारे देश में हॉकी, फूटबाल जैसे विश्वस्तरीय खेलों के बीच एक अच्छी पैठ बनाने की दश्तक दे चुका था, और इसकी बुनियाद देने का काम १९८३ में कपिल देव, सुनील गावसकर, मोहिंदर अमरनाथ, दिलीप वेंगसरकर जैसे महारथियों ने भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलवा कर किया था| लेकिन वो दिन आज भी मुझे याद है जब इसे गति देने का काम किया था ऑस्ट्रेलिया की धरती पे चॅंपियन्स ट्रोफी की जीत ने...| रवि शास्त्री को मैंन ऑफ द सिरीज़ में ऑडी कार दी गयी थी, और टीम के सारे खिलाड़ी उस कार में बैठ जीत का जस्न मना रहे थे... और मैं अपने परोश के मित्र के साथ सामने वाले मंडल जी के घर की खिड़की से टेलिवीजॅन में आ रहे उस विहंगम दृश्य का आनंद ले रहे थे| उस वक़्त हमारे शहर के कुछ ही घरों में टेलिवीजॅन सेट हुआ करता था| फिर हम उस दृश्य का रिहरशल उस घर पे रखी एक पुरानी जीप पे बैठ हर दिन किया करते... और संभवतः ऐसी स्वप्निल मानसिकता उस समय के युवा वर्ग में चरम पे थी| भारत ने क्रिकेट की जिस साख को विदेशी ज़मीनी पे पनपाया था आज ज़रूरत थी उस साख को बनाए रखने की भी... | फिर शारजाह में पाकिस्तान के जावेद मियाँदाद का भारत के चेतन शर्मा के मॅच के अंतिम गेंद पे पड़े छक्के को कोई कैसे भूल सकता है| ... जीत और हार के इसी दंश में आगमन हुआ क्रिकेट के ध्रुव का... जिसका नाम था सचिन रमेश तेंदुलकर| महज १६ साल में ही १९८९ के पाकिस्तान दौरे में भारतीय टीम में चयन होना, काफ़ी अचम्भित करने जैसा था| हमारे स्कूली दिनो में वो हमेशा चर्चा का विषय बना रहता और फिर कभी मॅच हो तो... स्कूल नहीं जाने के कितने बहानो को अंजाम देना होता| पाकिस्तान में हुए उस चॅरिटी मॅच में जिसमे सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के महान लेग स्पीनेर अब्दुल क़ादिर के लगातार चार गेंदों पे छक्के जड़े थे वो स्कूल के बहाने अपने सामने वाले प्रोफेसर साहब के यहाँ जाकर ही देखा था| मेरे डॉन बॉस्को स्कूल के दिनो में मैं ओपनिंग करता और एक ओर से विकेट बचाने का प्रयास किया करता| मुझे उस समय मोंहम्मद अज़हरुद्दीन की क्लास बहूत भाती, और यह मेरी पतली दुबली काया के अनुकूल भी थी| फिर एक बार हमारी क्लास की टीम एक जूनियर क्लास के टीम से हार गयी| उस टीम में एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज था, मनीष वर्धन, जिसका बाद में झारखंड स्टेट से रणजी ट्रॉफ़ी के लिए आज के भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के साथ सेलेक्षन हुआ और फिर उसने झारखंड की कप्तानी भी की और आज भी भारतीय रेलवे में कार्यरत रह झारखंड के लिए खेल रहा है|
अपने नागपुर के इंजिनियरिंग दिनो में पहली बार भारत और श्री लंका के बीच हुए टेस्ट मॅच को देखने का मौका मिला| भारत ने टॉस जीत पहले बल्लेबाजी का फ़ैसला किया था, और पहले दिन का खेल ख़त्म होने तक नवजोत सिंह सिद्धू और सचिन तेंदुलकर क्रीज़ पे थे| बस क्या था... मॅच के दूसरे दिन हम निकल पड़े नागपुर के विदर्भ स्टेडियम की ओर...| नागपुर के सारे रास्ते स्टेडियम की ओर ही जा रहे थे| एक अजीब सा आकर्षण था, मॅच देखने से ज़्यादा... तेंदुलकर को बॅटिंग करते देखने का था... अंदर जाने की लंबी क़तारों में टिकेट हाथ में लिए... फिर जैसे ही स्टेडियम के अंदर पहुँचा, तो सीधा जा पहुँचा एक दम उपर....| उस जगह से दृश्य ऐसा मानो... हरे भरे मैदान में हम सभो का चहेता ... सचिन तेंदुलकर की कृष्ण-लीला हमें लुभा रही हो... कुछ इस तरह......... क्रमश:... क्रमशः....|
विप्र प्रयाग घोष
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