जीवन नित नये दिन आपको एक सत्य की ओर ले जाने की कोशिश करती जाती है| बस आप और आप की इच्छाशक्ति इसे किस रूप में ढाल पाती है ये आज भी भविष्य के गर्भ में झाँकने की सकारात्मक कोशिश भर ही तो है| आज से कुछ दिन पहले जहाँ मैं कार्यरत था, विद्या-दान इंजिनियरिंग कॉलेज बक्शर में, वहाँ के डाइरेक्टर का मेरी मोबाइल पे एक संदेश आया की, उस संस्थान के परिसर में साई बाबा की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा वहाँ वर्षों से बन रहे मंदिर में कर दी गयी है, आप चाहें तो इस पावन अवसर पे यहाँ आ सकते हैं| इस खबर की अनुभूति खुद को बहूत तृप्त करने जैसा था| मैं उस वक़्त पटना में था| फिर जैसे मैं मन ही मन वहाँ जाने की तैयारी करने लगा| दिन के भोजन के बाद कुछ पल आराम किया| फिर पता नहीं नींद कहाँ से आ गयी और फिर जब जगा तो वह विहंगम रूप मेरे आँखों के सामने था, जो मैने स्वप्न में देखा था| जैसे इस त्रिमूर्त रूप को मैं क्या नाम दूं... जो मैने उस रूप को उस संस्थान के परिसर में अपने स्वप्न में देख कर जगा था| झट मैने इस जानकारी को वहाँ के डाइरेक्टर को कुछ इस तरह दे पाया..." की सर मैने तो वहाँ त्रि-मुख विष्णु रूप के मंदिर को बनते देखा है..."| ये बात १७-११-२०१३ की है|
फिर मैं पूर्णिया आ गया..| फिर आज से दो दिन पहले हिन्दुस्तान दैनिक के एडिटोरियल पेज को जैसे ही पढ़ने के लिए खोला तो मेरी नज़र उस विहंगम रूप पे जा टिकी... जिस रूप को मैने उस दिन अपने स्वप्न में देखा था| उस अद्भुत रूप का नाम भगवान दत्तात्रेय के रूप में मिला, और हिंदू पौराणिक अध्यात्म से जुड़ी उनकी जानकारियाँ| उस आलेख में महा योगेश्वर दत्तात्रेय की जन्म तारीख १६ डिसेंबर की मिली... और मैं अपने सुखद आश्चर्य में था की ठीक १६ डिसेंबर २०१२ को मैं उस संस्थान को जाय्न किया था, और मानो उस संस्थान की दैविक आभामंडल आज भी प्रभाव बिखेर रही है...| फिर झट मै इस जानकारी को भी वहाँ के डाइरेक्टर को कुछ इस तरह दे पाया..." की सर मैने तो वहाँ त्रि-मुख विष्णु रूप के मंदिर को बनते देखा था, वह विहंगम रूप भगवान दत्तात्रेय का था ..."
विप्र प्रयाग
http://en.wikipedia.org/wiki/Dattatreya
फिर मैं पूर्णिया आ गया..| फिर आज से दो दिन पहले हिन्दुस्तान दैनिक के एडिटोरियल पेज को जैसे ही पढ़ने के लिए खोला तो मेरी नज़र उस विहंगम रूप पे जा टिकी... जिस रूप को मैने उस दिन अपने स्वप्न में देखा था| उस अद्भुत रूप का नाम भगवान दत्तात्रेय के रूप में मिला, और हिंदू पौराणिक अध्यात्म से जुड़ी उनकी जानकारियाँ| उस आलेख में महा योगेश्वर दत्तात्रेय की जन्म तारीख १६ डिसेंबर की मिली... और मैं अपने सुखद आश्चर्य में था की ठीक १६ डिसेंबर २०१२ को मैं उस संस्थान को जाय्न किया था, और मानो उस संस्थान की दैविक आभामंडल आज भी प्रभाव बिखेर रही है...| फिर झट मै इस जानकारी को भी वहाँ के डाइरेक्टर को कुछ इस तरह दे पाया..." की सर मैने तो वहाँ त्रि-मुख विष्णु रूप के मंदिर को बनते देखा था, वह विहंगम रूप भगवान दत्तात्रेय का था ..."
भगवान दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष माह दिसंबर में मनाई जाती है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं इसीलिए उन्हें 'परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु'और 'श्रीगुरुदेवदत्त'भी कहा जाता हैं। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साथक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं अनुसार दत्तात्रेय ने पारद से व्योमयान उड्डयन की शक्ति का पता लगाया था और चिकित्सा शास्त्र में क्रांतिकारी अन्वेषण किया था।
हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।
भगवान दत्तात्रेय ने जीवन में कई लोगों से शिक्षा ली। दत्तात्रेय ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्यकलापों से भी शिक्षा ग्रहण की। दत्तात्रेयजी कहते हैं कि जिससे जितना-जितना गुण मिला है उनको उन गुणों को प्रदाता मानकर उन्हें अपना गुरु माना है, इस प्रकार मेरे 24 गुरु हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत, अजगर, सिंधु, पतंग, भ्रमर, मधुमक्खी, गज, मृग, मीन, पिंगला, कुररपक्षी, बालक, कुमारी, सर्प, शरकृत, मकड़ी और भृंगी।
ब्रह्माजी के मानसपुत्र महर्षि अत्रि इनके पिता तथा कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्र के प्रवक्ता कपिलदेव की बहन सती अनुसूया इनकी माता थीं। श्रीमद्भागवत में महर्षि अत्रि एवं माता अनुसूया के यहाँ त्रिदेवों के अंश से तीन पुत्रों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है।
पुराणों अनुसार इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप है। चित्र में इनके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठ, आश्रम और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के चित्र का दर्शन होता है।
हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।
भगवान दत्तात्रेय ने जीवन में कई लोगों से शिक्षा ली। दत्तात्रेय ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्यकलापों से भी शिक्षा ग्रहण की। दत्तात्रेयजी कहते हैं कि जिससे जितना-जितना गुण मिला है उनको उन गुणों को प्रदाता मानकर उन्हें अपना गुरु माना है, इस प्रकार मेरे 24 गुरु हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत, अजगर, सिंधु, पतंग, भ्रमर, मधुमक्खी, गज, मृग, मीन, पिंगला, कुररपक्षी, बालक, कुमारी, सर्प, शरकृत, मकड़ी और भृंगी।
ब्रह्माजी के मानसपुत्र महर्षि अत्रि इनके पिता तथा कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्र के प्रवक्ता कपिलदेव की बहन सती अनुसूया इनकी माता थीं। श्रीमद्भागवत में महर्षि अत्रि एवं माता अनुसूया के यहाँ त्रिदेवों के अंश से तीन पुत्रों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है।
पुराणों अनुसार इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप है। चित्र में इनके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठ, आश्रम और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के चित्र का दर्शन होता है।
उनके प्रमुख तीन शिष्य थे जो तीनों ही राजा थे। दो यौद्धा जाति से थे तो एक असुर जाति से। उनके शिष्यों में भगवान परशुराम व बलराम का भी नाम लिया जाता है। तीन संप्रदाय (वैष्णव, शैव और शाक्त) के संगम स्थल के रूप में भारतीय राज्य त्रिपुरा में उन्होंने शिक्षा-दीक्षा दी। इस त्रिवेणी के कारण ही प्रतीकस्वरूप उनके तीन मुख दर्शाएँ जाते हैं जबकि उनके तीन मुख नहीं थे।
मान्यता अनुसार दत्तात्रेय ने परशुरामजी को श्रीविद्या-मंत्र प्रदान की थी। यह मान्यता है कि शिवपुत्र कार्तिकेय को दत्तात्रेय ने अनेक विद्याएँ दी थी। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय दत्तात्रेय को ही जाता है।
दूसरी ओर मुनि सांकृति को अवधूत मार्ग, कार्तवीर्यार्जुन को तन्त्र विद्या एवं नागार्जुन को रसायन विद्या इनकी कृपा से ही प्राप्त हुई थी। गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेय की भक्ति से प्राप्त हुआ।
दत्तात्रेय का उल्लेख मार्कण्डेेय पुुुुराण व अन्य पुराणों में मिलता है। इन पर दो ग्रंथ हैं 'अवतार-चरित्र' और 'गुरुचरित्र', जिन्हें वेदतुल्य माना गया है। इसकी रचना किसने की यह हम नहीं जानते। मार्गशीर्ष 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक दत्त भक्तों द्वारा गुरुचरित्र का पाठ किया जाता है। इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। इसमें श्रीपाद, श्रीवल्लभ और श्रीनरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है।
ऐसी मान्यता है कि दत्तात्रेय नित्य प्रात: काशी में गंगाजी में स्नान करते थे। इसी कारण काशी के मणिकर्णिका घाट की दत्त पादुका दत्त भक्तों के लिए पूजनीय स्थान है। इसके अलावा मुख्य पादुका स्थान कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है। देश भर में भगवान दत्तात्रेय को गुरु के रूप में मानकर इनकी पादुका को नमन किया जाता है।
' गुरुचरित्र'का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा'का सामूहिक जप भी किया है। त्रिपुरा रहस्य में दत्त-भार्गव-संवाद के रूप में अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का उपदेश मिलता है।
मान्यता अनुसार दत्तात्रेय ने परशुरामजी को श्रीविद्या-मंत्र प्रदान की थी। यह मान्यता है कि शिवपुत्र कार्तिकेय को दत्तात्रेय ने अनेक विद्याएँ दी थी। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय दत्तात्रेय को ही जाता है।
दूसरी ओर मुनि सांकृति को अवधूत मार्ग, कार्तवीर्यार्जुन को तन्त्र विद्या एवं नागार्जुन को रसायन विद्या इनकी कृपा से ही प्राप्त हुई थी। गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेय की भक्ति से प्राप्त हुआ।
दत्तात्रेय का उल्लेख मार्कण्डेेय पुुुुराण व अन्य पुराणों में मिलता है। इन पर दो ग्रंथ हैं 'अवतार-चरित्र' और 'गुरुचरित्र', जिन्हें वेदतुल्य माना गया है। इसकी रचना किसने की यह हम नहीं जानते। मार्गशीर्ष 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक दत्त भक्तों द्वारा गुरुचरित्र का पाठ किया जाता है। इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। इसमें श्रीपाद, श्रीवल्लभ और श्रीनरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है।
ऐसी मान्यता है कि दत्तात्रेय नित्य प्रात: काशी में गंगाजी में स्नान करते थे। इसी कारण काशी के मणिकर्णिका घाट की दत्त पादुका दत्त भक्तों के लिए पूजनीय स्थान है। इसके अलावा मुख्य पादुका स्थान कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है। देश भर में भगवान दत्तात्रेय को गुरु के रूप में मानकर इनकी पादुका को नमन किया जाता है।
' गुरुचरित्र'का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा'का सामूहिक जप भी किया है। त्रिपुरा रहस्य में दत्त-भार्गव-संवाद के रूप में अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का उपदेश मिलता है।
विप्र प्रयाग
http://en.wikipedia.org/wiki/Dattatreya

