Wednesday, 2 October 2013

"साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...!!!"



महात्मा गाँधी के इस पिक्चर को मैं जब भी देखता हूँ तो साबरमती आश्रम की याद तरोताजा हो जाती है। वर्ष २००३ के अगस्त महीने मैं अहमदाबाद गुजरात में था। एक दिन अचानक लगा की गाँधीजी के साबरमती आश्रम को चलो घूम आते हैं। वो रविवार का दिन था। आश्रम के  अंदर जाने की कतार में ना जाने कितने विदेशी पर्यटकों को भी देखा, जो चीन, जापान, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका मूल से थे। इस जाते भीड़ को अंदर जाते देख लगा जैसे भारतीयों में गाँधी दर्शन की उत्सुकता थोड़ी कम हो गयी है, जितना इन विदेशी मूल से आए सैलानियों की तेज़ी को देख लग रहा था। मैने रुककर कुछ जापानी स्टूडेंट्स से भी बातें की और लगा जैसे वो महात्मा गाँधी के जीवनी और संघर्ष यात्रा पे रिसर्च करने आयें हों। अपने भारत में तो बचपन के शुरुआती दिनो से ही बच्चों को महात्मा गाँधी के मंत्र कूट कूट कर दे दियें जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता की कभी कभी बुरा देखा भी जाता है, बुरा सुना भी जाता है और बुरा किया भी जाता है। नहीं तो जिस आज़ादी के लिए इस महात्मा ने इतना संघर्ष किया, उन्हें सदन और संसद के आगे रख... आज के भारत में क्या क्या किया जा रहा है... इसे हमारे नेताओं से लेकर मीडीया वालों तक ने गाँधी के तीन बंदरों की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी है। जिसका सीधा प्रभाव आज के मोबाइल से लैस नयी पीढ़ी पे सीधा पड़ रहा है। अपने १० वर्षों के कार्यानुभव में मैने पूर्णियाँ से लेकर बक्शर के सफ़र को देखा, और कुछ दिन हुए एक वरिष्ट पत्रकार से बातों के दौरान मेरे मुख से ये शब्द सहसा निकल ही पड़े ".... की आज भी लगता है, मानो आम जनों की मानसिकता सुखी की सुखी पड़ी हुई है।" मेरे इस कथन को उन्होने अपने गहरी साँसों से बड़ी विनम्रता से लिया। शायद ये मेरे अनुभव की पुष्टि के लिए काफ़ी था। तब आज लगता हैं की क्यों भारत आकर गाँधी ने अपना चोला बदला होगा, फिर क्यों आज के नेता और बिज़्नेसमॅन तक वैचारिक चोलो को उतार, करप्शन और घोटालों के चादर को ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझते हैं। फिर क्यों आज जय प्रकाश आंदोलन से वैचारिक शक्तियों को लिए एक उद्वेलित नेता, अपने नेतृत्व शक्ति को घोटालों की आड़ लिए कारागृह पहुँच, ज़्यादा सुकून में जीता है और सत्ता संचालन मन्त्र एक नयी पीढ़ी कुछ यों सौंपता है की संघर्ष करने वाला ही जेल जाता है। मानो आज भी आज़ादी के लंबे अंतराल के बाद भूख, अशिक्षा, ग़रीबी से लड़ता भारत... सामंतवादी सोच लिए, संतों को ही जीता आ रहा है, जिसकी आधारशिला रखने का काम महात्मा गाँधी जैसा कलम की वक़ालात करने वाला एक बैरिस्टर ही कर सकता था और आज भी हम इस अभिवादन में कुछ यूँ ही गुणगान करते हैं.. "दे दी हमें आज़ादी बिना शस्त्र बिना ढाल.. साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.. ।।रघुपति राघव राजाराम।। "

विनायक रंजन


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