Thursday, 3 October 2013

" लाल बहादुर शास्त्री को जीना.. ही सच्चा समर्पण...!!!"

वास्तव में जब भी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ज़िक्र आते ही मन उस सुनहरी गिलहरी को छूने को करता है, जिसने भारतीयों में कर्म, संकल्प और सादगी को अपने संघर्षपूर्ण जीवन से अंगीकृत किया। फिर जीवन के प्रति ये अंगीकार कैसा..!!

   उनके बचपन के दिनो को याद करूं तो आज भी वो सारे किस्से सहस उस संकल्प को याद दिलाते हैं की कैसे वे अपनी पढ़ाई के लिए नदी को तैर कर पार किया करते थे, और अपने स्कूल पहुँचा करते थे। ऐसा ही जिक्र कभी मेरे दादाजी ने भी मुझसे किया था.. जब वे अपने मित्रों के साथ बाँका की चांदन और अंधरी नदियों को तैर कर पार किया करते थे।

    मैं अपने डॉन बॉस्को स्कूल, पूर्णिया के दिनो को याद करूँ तो मुझे ऐसे साक्ष्य संकल्प का स्पर्श हर दिन हो जाता और आज भी ये मेरे लिए एक सौभाग्य की बात है। मेरे बचपन का एक अभिन्न मित्र पूर्णिया के पस्चिम में स्थित चुनापूर गॉव से प्नत्येक दिन अपने भाई के साथ स्कूल आता, लेकिन कभी कभी दिखने में आता की उनके पॅंट और शर्ट दोनो भींगे हुए हैं। फिर जो हुआ.. वो युं कि पूर्णिया और उनके गॉव के बीच होकर एक सौढा नदी बहती है, जब कभी नाव नहीं मिलती तो उन्हें नदी तैर कर ही पार करनी पड़ती है। मैं शायद उस समय चौथी क्लास में था। उस घटना ने मेरी उसकी तरफ अपनी संवेदनशीलता को कुछ गति दे दी हो मानो। फिर तो वो मेरा लाल बहादुर शास्त्री ही था, जो मुझे बचपन मे ही मिल गया। मैं जब भी घर से टिफिन लेकर जाता तो माँ को कह दो तीन रोटियाँ और दे देने को कहता... ये जानकर की वो टिफिन लेकर नहीं आता। आज भी याद है, जब मैं अपने दादाजी की साइकल से धीरे धीरे साइकल चलाना सीख रहा था। जैसे ही थोड़ा कॉन्फिडेंट हुआ की एक दिन रविवार को उस दोस्त से मिलने पूर्णिया से बाहर पहली बार अपनी साइकल लिए निकल पड़ा। वो उस पार नदी के बगल में मेरा इंतज़ार कर रहा था। फिर मैं उसके घर गये, और पूर्णिया के बगल में ग्राम्य जीवन का पहली बार भरपूर रस ले पाया। बीते उन पलों का आज भी ऋणी हूँ।

जीवन को फिर आगे बढ़ते देखा, मैट्रिक के बाद इंटर्मीडियेट फिर इंजिनियरिंग और फिर सेवा..। विगत कुछ दिनो बक्सर बिहार के मेरे कार्यानुभव ने तो जीवन के इस सूखेपन को जैसे पाटने का काम किया.. अमृत देने का काम किया। भारत सरकार के डी. आर. डी. ओ. से सेवा-निवृत्ति ले कुछ अधिकारियों ने यहाँ ३-४ वर्ष पूर्व इंजिनियरिंग कॉलेज खोलने का एक सटीक प्रयास किया है। इस प्रकार के प्रयासों  को अगर बल मिले तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने बिहार को भी कैलीफोर्निया बनते ना देख पायें। अधिकारियों का प्रयास केवल इंजिनियरिंग डेवेलपमेंट तक सीमित ना रह सामूहिक विकाश का है, ताकि वहाँ के किसानो को भी इस डेवेलपमेंट में सही हक़ मिल पाए। उस जगह काम करते वक़्त मैने पाया की क्यों ना इस जगह भारत सरकार की मदद से यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेन्स को स्थापित किया जाए, मेरी ये सोच सराहनीय थी... तो सहसा मुझे लाल बहादुर शास्त्री के "जय जवान, जय किसान" का नारा याद आया... जो खुद में सुखद था, की आज भी हमारे देश को उन संकल्प सिद्धों की कितनी ज़रूरत है.. !!!  वहाँ रहते ही मैने वहाँ आस पास बसे गावों का दौरा भी किया, और देखा की यहाँ भी कम आय श्रोतो के वाबजूद जीवन कितना खुशहाल है। शहर कोसों दूर... मगर जीवन की स्पष्टता कितनी पास है। फिर क्या था मैने भी अपना चोला बदला। खादी को अपनाया, और समा गया उस प्रकृति में..। सादगी से भरी थी वो जिंदगी... लेकिन मन की बुलंदी साथ थी... यही सोच कर कुछ शास्त्रीजी को जी तो पाया, जीवन के उन अनछूए मर्मों का कुछ स्नेहपूर्ण स्पर्श तो कर पाया..।

विनायक रंजन

No comments:

Post a Comment