Friday, 25 October 2013

" सचिन तेंदुलकर का क्रिकेट से सन्यास.., जैसे एक विहंगम योगी का मौन हो जाना...!!! "

    धन्य हुआ क्रिकेट जगत की तुम आए, अपनी विलक्षण शक्ति का प्रदर्शन कर एक ध्रुव केन्द्र को समा गये|
 
आज संपूर्ण क्रिकेट जगत मानो इसी सोच लिए खुद को थोड़ा खूश करने की कोशिश में जुटा हुआ है| सन् १९८९ से अनवरत क्रिकेट की दुनिया को अपना लोहा मनवाने का सपना लिए वो हर दिन एक नयी मंज़िल को छूता चला गया, और सचिन तेंदुलकर के इस सफ़र में तय होते गये वो सारे रास्ते जो कभी इस खेल को लिपीबद्ध करने वाले जॉन विस्डेन ने शायद ही कभी सोचा होगा की इंग्लेंड की धरती पे जन्मा यह खेल आज ऑस्ट्रेलिया, साउत अफ्रीका, न्यूजीलॅंड  होते हुए भारतीय उपनिवेश में ही पुनर्जन्म लेगा और इस पुनर्जन्म का सूत्रधार बनेगा... मास्टर ब्लास्टर  सचिन रमेश तेंदुलकर....|

 यह बात १९८९ की है, उस वक़्त मैं सातवी क्लास का छात्र था| क्रिकेट मे काफ़ी रूचि रखता था और आज भी बदस्तूर जारी है| ये वो वक़्त था, जब क्रिकेट हमारे देश में हॉकी, फूटबाल जैसे विश्वस्तरीय खेलों के बीच एक अच्छी पैठ बनाने की दश्तक दे चुका था, और इसकी बुनियाद देने का काम १९८३ में कपिल देव, सुनील गावसकर, मोहिंदर अमरनाथ, दिलीप वेंगसरकर  जैसे महारथियों ने भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलवा कर किया था| लेकिन वो दिन आज भी मुझे याद है जब इसे गति देने का काम किया था ऑस्ट्रेलिया की धरती पे चॅंपियन्स ट्रोफी की जीत ने...| रवि शास्त्री को मैंन ऑफ द सिरीज़ में ऑडी कार दी गयी थी, और टीम के सारे खिलाड़ी उस कार में बैठ जीत का जस्न मना रहे थे... और मैं अपने परोश के मित्र के साथ सामने वाले मंडल जी के घर की खिड़की से टेलिवीजॅन में आ रहे उस विहंगम दृश्य का आनंद ले रहे थे| उस वक़्त हमारे शहर के कुछ ही घरों में टेलिवीजॅन सेट हुआ करता था| फिर हम उस दृश्य का रिहरशल उस घर पे रखी एक पुरानी जीप पे बैठ हर दिन किया करते... और संभवतः ऐसी स्वप्निल मानसिकता उस समय के युवा वर्ग में चरम पे थी|  भारत ने क्रिकेट की  जिस साख को विदेशी ज़मीनी पे पनपाया था आज ज़रूरत थी उस साख को बनाए रखने की भी... | फिर शारजाह में पाकिस्तान के जावेद मियाँदाद का भारत के चेतन शर्मा के मॅच के अंतिम गेंद पे पड़े छक्के को कोई कैसे भूल सकता है| ... जीत और हार के इसी दंश में आगमन हुआ क्रिकेट के ध्रुव का... जिसका नाम था सचिन रमेश तेंदुलकर| महज १६ साल में ही १९८९ के पाकिस्तान दौरे में भारतीय टीम में चयन होना, काफ़ी अचम्भित करने जैसा था| हमारे स्कूली दिनो में वो हमेशा चर्चा का विषय बना रहता और फिर कभी मॅच हो तो... स्कूल नहीं जाने के कितने बहानो को अंजाम देना होता| पाकिस्तान में हुए उस चॅरिटी मॅच में जिसमे सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के महान लेग स्पीनेर अब्दुल क़ादिर के लगातार चार गेंदों पे छक्के जड़े थे वो स्कूल के बहाने अपने सामने वाले प्रोफेसर साहब के यहाँ जाकर ही देखा था| मेरे डॉन बॉस्को स्कूल के दिनो में मैं ओपनिंग करता और एक ओर  से विकेट बचाने का प्रयास किया करता| मुझे उस समय मोंहम्मद अज़हरुद्दीन की क्लास बहूत भाती, और यह मेरी पतली दुबली काया के अनुकूल भी थी| फिर एक बार हमारी क्लास  की टीम एक जूनियर क्लास के टीम से हार गयी| उस टीम में एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज था, मनीष वर्धन, जिसका बाद में झारखंड स्टेट से रणजी ट्रॉफ़ी के लिए आज के भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के साथ सेलेक्षन हुआ और फिर उसने झारखंड की कप्तानी भी की और आज भी भारतीय रेलवे में कार्यरत रह झारखंड के लिए खेल रहा है|

     अपने नागपुर के इंजिनियरिंग दिनो में पहली बार भारत और श्री लंका के बीच हुए टेस्ट मॅच को देखने का मौका मिला| भारत ने टॉस जीत पहले बल्लेबाजी का फ़ैसला किया था, और पहले दिन का खेल ख़त्म होने तक नवजोत सिंह सिद्धू और सचिन तेंदुलकर क्रीज़ पे थे| बस क्या था... मॅच के दूसरे दिन हम निकल पड़े नागपुर के विदर्भ स्टेडियम की ओर...| नागपुर के सारे रास्ते स्टेडियम की ओर ही जा रहे थे| एक अजीब सा आकर्षण था, मॅच देखने से ज़्यादा... तेंदुलकर को बॅटिंग करते देखने का था... अंदर जाने की लंबी क़तारों में टिकेट हाथ में लिए... फिर जैसे ही स्टेडियम के अंदर पहुँचा, तो सीधा जा पहुँचा एक दम उपर....| उस जगह से दृश्य ऐसा मानो... हरे भरे मैदान में हम सभो का चहेता ...  सचिन तेंदुलकर की कृष्ण-लीला  हमें लुभा रही हो... कुछ इस तरह......... क्रमश:... क्रमशः....|

विप्र प्रयाग घोष  


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Thursday, 3 October 2013

" लाल बहादुर शास्त्री को जीना.. ही सच्चा समर्पण...!!!"

वास्तव में जब भी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ज़िक्र आते ही मन उस सुनहरी गिलहरी को छूने को करता है, जिसने भारतीयों में कर्म, संकल्प और सादगी को अपने संघर्षपूर्ण जीवन से अंगीकृत किया। फिर जीवन के प्रति ये अंगीकार कैसा..!!

   उनके बचपन के दिनो को याद करूं तो आज भी वो सारे किस्से सहस उस संकल्प को याद दिलाते हैं की कैसे वे अपनी पढ़ाई के लिए नदी को तैर कर पार किया करते थे, और अपने स्कूल पहुँचा करते थे। ऐसा ही जिक्र कभी मेरे दादाजी ने भी मुझसे किया था.. जब वे अपने मित्रों के साथ बाँका की चांदन और अंधरी नदियों को तैर कर पार किया करते थे।

    मैं अपने डॉन बॉस्को स्कूल, पूर्णिया के दिनो को याद करूँ तो मुझे ऐसे साक्ष्य संकल्प का स्पर्श हर दिन हो जाता और आज भी ये मेरे लिए एक सौभाग्य की बात है। मेरे बचपन का एक अभिन्न मित्र पूर्णिया के पस्चिम में स्थित चुनापूर गॉव से प्नत्येक दिन अपने भाई के साथ स्कूल आता, लेकिन कभी कभी दिखने में आता की उनके पॅंट और शर्ट दोनो भींगे हुए हैं। फिर जो हुआ.. वो युं कि पूर्णिया और उनके गॉव के बीच होकर एक सौढा नदी बहती है, जब कभी नाव नहीं मिलती तो उन्हें नदी तैर कर ही पार करनी पड़ती है। मैं शायद उस समय चौथी क्लास में था। उस घटना ने मेरी उसकी तरफ अपनी संवेदनशीलता को कुछ गति दे दी हो मानो। फिर तो वो मेरा लाल बहादुर शास्त्री ही था, जो मुझे बचपन मे ही मिल गया। मैं जब भी घर से टिफिन लेकर जाता तो माँ को कह दो तीन रोटियाँ और दे देने को कहता... ये जानकर की वो टिफिन लेकर नहीं आता। आज भी याद है, जब मैं अपने दादाजी की साइकल से धीरे धीरे साइकल चलाना सीख रहा था। जैसे ही थोड़ा कॉन्फिडेंट हुआ की एक दिन रविवार को उस दोस्त से मिलने पूर्णिया से बाहर पहली बार अपनी साइकल लिए निकल पड़ा। वो उस पार नदी के बगल में मेरा इंतज़ार कर रहा था। फिर मैं उसके घर गये, और पूर्णिया के बगल में ग्राम्य जीवन का पहली बार भरपूर रस ले पाया। बीते उन पलों का आज भी ऋणी हूँ।

जीवन को फिर आगे बढ़ते देखा, मैट्रिक के बाद इंटर्मीडियेट फिर इंजिनियरिंग और फिर सेवा..। विगत कुछ दिनो बक्सर बिहार के मेरे कार्यानुभव ने तो जीवन के इस सूखेपन को जैसे पाटने का काम किया.. अमृत देने का काम किया। भारत सरकार के डी. आर. डी. ओ. से सेवा-निवृत्ति ले कुछ अधिकारियों ने यहाँ ३-४ वर्ष पूर्व इंजिनियरिंग कॉलेज खोलने का एक सटीक प्रयास किया है। इस प्रकार के प्रयासों  को अगर बल मिले तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने बिहार को भी कैलीफोर्निया बनते ना देख पायें। अधिकारियों का प्रयास केवल इंजिनियरिंग डेवेलपमेंट तक सीमित ना रह सामूहिक विकाश का है, ताकि वहाँ के किसानो को भी इस डेवेलपमेंट में सही हक़ मिल पाए। उस जगह काम करते वक़्त मैने पाया की क्यों ना इस जगह भारत सरकार की मदद से यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेन्स को स्थापित किया जाए, मेरी ये सोच सराहनीय थी... तो सहसा मुझे लाल बहादुर शास्त्री के "जय जवान, जय किसान" का नारा याद आया... जो खुद में सुखद था, की आज भी हमारे देश को उन संकल्प सिद्धों की कितनी ज़रूरत है.. !!!  वहाँ रहते ही मैने वहाँ आस पास बसे गावों का दौरा भी किया, और देखा की यहाँ भी कम आय श्रोतो के वाबजूद जीवन कितना खुशहाल है। शहर कोसों दूर... मगर जीवन की स्पष्टता कितनी पास है। फिर क्या था मैने भी अपना चोला बदला। खादी को अपनाया, और समा गया उस प्रकृति में..। सादगी से भरी थी वो जिंदगी... लेकिन मन की बुलंदी साथ थी... यही सोच कर कुछ शास्त्रीजी को जी तो पाया, जीवन के उन अनछूए मर्मों का कुछ स्नेहपूर्ण स्पर्श तो कर पाया..।

विनायक रंजन

Wednesday, 2 October 2013

"साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...!!!"



महात्मा गाँधी के इस पिक्चर को मैं जब भी देखता हूँ तो साबरमती आश्रम की याद तरोताजा हो जाती है। वर्ष २००३ के अगस्त महीने मैं अहमदाबाद गुजरात में था। एक दिन अचानक लगा की गाँधीजी के साबरमती आश्रम को चलो घूम आते हैं। वो रविवार का दिन था। आश्रम के  अंदर जाने की कतार में ना जाने कितने विदेशी पर्यटकों को भी देखा, जो चीन, जापान, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका मूल से थे। इस जाते भीड़ को अंदर जाते देख लगा जैसे भारतीयों में गाँधी दर्शन की उत्सुकता थोड़ी कम हो गयी है, जितना इन विदेशी मूल से आए सैलानियों की तेज़ी को देख लग रहा था। मैने रुककर कुछ जापानी स्टूडेंट्स से भी बातें की और लगा जैसे वो महात्मा गाँधी के जीवनी और संघर्ष यात्रा पे रिसर्च करने आयें हों। अपने भारत में तो बचपन के शुरुआती दिनो से ही बच्चों को महात्मा गाँधी के मंत्र कूट कूट कर दे दियें जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता की कभी कभी बुरा देखा भी जाता है, बुरा सुना भी जाता है और बुरा किया भी जाता है। नहीं तो जिस आज़ादी के लिए इस महात्मा ने इतना संघर्ष किया, उन्हें सदन और संसद के आगे रख... आज के भारत में क्या क्या किया जा रहा है... इसे हमारे नेताओं से लेकर मीडीया वालों तक ने गाँधी के तीन बंदरों की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी है। जिसका सीधा प्रभाव आज के मोबाइल से लैस नयी पीढ़ी पे सीधा पड़ रहा है। अपने १० वर्षों के कार्यानुभव में मैने पूर्णियाँ से लेकर बक्शर के सफ़र को देखा, और कुछ दिन हुए एक वरिष्ट पत्रकार से बातों के दौरान मेरे मुख से ये शब्द सहसा निकल ही पड़े ".... की आज भी लगता है, मानो आम जनों की मानसिकता सुखी की सुखी पड़ी हुई है।" मेरे इस कथन को उन्होने अपने गहरी साँसों से बड़ी विनम्रता से लिया। शायद ये मेरे अनुभव की पुष्टि के लिए काफ़ी था। तब आज लगता हैं की क्यों भारत आकर गाँधी ने अपना चोला बदला होगा, फिर क्यों आज के नेता और बिज़्नेसमॅन तक वैचारिक चोलो को उतार, करप्शन और घोटालों के चादर को ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझते हैं। फिर क्यों आज जय प्रकाश आंदोलन से वैचारिक शक्तियों को लिए एक उद्वेलित नेता, अपने नेतृत्व शक्ति को घोटालों की आड़ लिए कारागृह पहुँच, ज़्यादा सुकून में जीता है और सत्ता संचालन मन्त्र एक नयी पीढ़ी कुछ यों सौंपता है की संघर्ष करने वाला ही जेल जाता है। मानो आज भी आज़ादी के लंबे अंतराल के बाद भूख, अशिक्षा, ग़रीबी से लड़ता भारत... सामंतवादी सोच लिए, संतों को ही जीता आ रहा है, जिसकी आधारशिला रखने का काम महात्मा गाँधी जैसा कलम की वक़ालात करने वाला एक बैरिस्टर ही कर सकता था और आज भी हम इस अभिवादन में कुछ यूँ ही गुणगान करते हैं.. "दे दी हमें आज़ादी बिना शस्त्र बिना ढाल.. साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.. ।।रघुपति राघव राजाराम।। "

विनायक रंजन


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